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क्या IDBI बैंक के निजीकरण पर लग सकता है ब्रेक!
आईडीबीआई बैंक (IDBI Bank) को बेचने की सरकार की कोशिशों को एक बड़ा झटका लग सकता है. पिछले तीन सालों से चल रही लंबी और जटिल प्रक्रिया अब अधर में लटकती दिख रही है. शुक्रवार को आई खबरों ने पूरे बैंकिंग जगत में हलचल मचा दी है. खबर है कि सरकार को इस बैंक के लिए जो बोलियां मिली हैं, वे उसकी उम्मीद से काफी कम हैं.
दरअसल, सरकार ने इस डील को आगे बढ़ाने के लिए एक 'रिजर्व प्राइस' (न्यूनतम कीमत) तय की थी. लेकिन जो दो बड़ी कंपनियां रेस में बची थीं, उन्होंने उस कीमत के नीचे बोली लगा दी है. विनिवेश के कड़े नियमों के चलते सरकार कम कीमत पर बैंक का हिस्सा नहीं बेच सकती. ऐसे में अब पूरी प्रक्रिया को ठंडे बस्ते में डालने या फिर से शुरू करने के अलावा कोई रास्ता नहीं दिख रहा है.
आईडीबीआई बैंक के विनिवेश को लेकर गुरुवार को सचिवों के कोर ग्रुप (Core Group of Secretaries) की एक अहम बैठक हुई थी. सूत्रों की मानें तो इस डील के लिए रिजर्व प्राइस करीब 130 रुपये प्रति शेयर के आसपास रखा गया था.
लेकिन जब 6 फरवरी को मिली बोलियों का आकलन किया गया, तो हकीकत कुछ और ही निकली. बिड लगाने वाली कंपनियों ने इस तय कीमत से कम का ऑफर दिया. नियम बहुत साफ हैं- अगर बोली रिजर्व प्राइस से कम है, तो सरकार उसे स्वीकार नहीं कर सकती. यही वजह है कि अब इस ट्रांजैक्शन के रुकने की पूरी संभावना बन गई है.
आईडीबीआई बैंक को खरीदने की इस दौड़ में शुरुआत में कई नाम थे, लेकिन आखिरी मोड़ तक आते-आते केवल दो ही बड़े दावेदार बचे थे. इनमें पहला नाम है फेयरफैक्स फाइनेंशियल (Fairfax Financial) और दूसरा है एमिरेट्स एनबीडी (Emirates NBD).
इससे पहले कोटक महिंद्रा बैंक ने भी इस प्रक्रिया में दिलचस्पी दिखाई थी, लेकिन बाद में उन्होंने अपना नाम वापस ले लिया. एमिरेट्स एनबीडी इस वक्त आरबीएल बैंक (RBL Bank) में हिस्सेदारी खरीदने की अपनी अलग प्रक्रिया में भी व्यस्त है. अब इन दोनों कंपनियों की कम बोली ने सरकार के विनिवेश लक्ष्य के सामने एक बड़ी दीवार खड़ी कर दी है.
सरकार और एलआईसी (LIC) मिलकर आईडीबीआई बैंक के मालिक हैं. वर्तमान में केंद्र सरकार के पास 45.48% और एलआईसी के पास 49.24% हिस्सेदारी है. सरकार का प्लान था कि वह कुल मिलाकर 60.7% हिस्सेदारी बेचेगी. इसमें सरकार का 30.48% और एलआईसी का 30.24% हिस्सा शामिल था.
इस डील के बाद सरकार के पास केवल 15% और एलआईसी के पास 19% हिस्सेदारी बचती. लेकिन अब जब बोलियां ही उम्मीद के मुताबिक नहीं मिली हैं, तो यह पूरा प्लान फिलहाल फेल होता दिख रहा है. अब इस प्रोसेस को आधिकारिक रूप से खत्म करने के लिए सरकार को औपचारिक मंजूरी लेनी होगी.
अगर सरकार इस मौजूदा बिडिंग प्रोसेस को रद्द करती है, तो उसे नए सिरे से पूरी प्रक्रिया शुरू करनी होगी. इसका मतलब है कि नई बोलियां (Fresh Bids) आमंत्रित की जाएंगी. तीन साल की कड़ी मेहनत के बाद अब फिर से वही लंबी प्रक्रिया दोहराना सरकार के लिए एक बड़ी चुनौती होगी. फिलहाल सरकार ने आधिकारिक रूप से इस पर कोई बयान जारी नहीं किया है, लेकिन बैंकिंग एक्सपर्ट्स का मानना है कि इस देरी का असर बैंक के भविष्य और विनिवेश के सरकारी लक्ष्य पर जरूर पड़ेगा.