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घर का मालिक बनना हर इंसान का सपना होता है, लेकिन बढ़ती प्रॉपर्टी कीमतों के बीच ये सपना ज्यादातर लोगों के लिए होम लोन के बिना पूरा नहीं होता. पहली बार घर खरीदने वालों के लिए होम लोन काफी बड़ा फैसला होता है, क्योंकि एक बार लोन ले लेने के बाद EMI की जिम्मेदारी सालों तक चलती है.
अगर आप भी होम लोन लेने की सोच रहे हैं, तो पहले इसकी ABCD समझ लेना जरूरी है ताकि बाद में कोई परेशानी, कन्फ्यूजन या एक्स्ट्रा चार्ज झेलना न पड़े. यहां समझिए होम लोन से जुड़ी 10 जरूरी बातें
लोन लेने से पहले ये चेक करना जरूरी है कि आप इसके लिए योग्य हैं या नहीं. बैंक आपकी इनकम, सैलरी की स्टेबिलिटी, उम्र, क्रेडिट स्कोर, नौकरी/बिजनेस की स्थिति और आश्रितों की संख्या देखकर तय करता है कि आपको कितना लोन मिल सकता है.
होम लोन तीन तरह के होते हैं:
| Loan Type | क्या होता है |
|---|---|
| Floating/Adjustable Rate | ब्याज दर समय के साथ बदलती है |
| Fixed Rate | पूरी अवधि में एक समान ब्याज दर |
| Combination Loan | आधा फिक्स्ड, आधा फ्लोटिंग |
अगर पहले से लोन प्री-अप्रूव हो, तो:
ज्यादातर बैंक प्रॉपर्टी वैल्यू का 75–90% तक लोन देते हैं. बाकी पैसा आपको डाउन पेमेंट के रूप में देना होता है. अगर को-एप्लिकेंट जोड़ते हैं, तो लोन अमाउंट बढ़ सकता है.
लोन सिर्फ ब्याज तक सीमित नहीं होता. इसमें शामिल होते हैं:
EMI में मूलधन और ब्याज दोनों शामिल होते हैं, और ये रकम आपको हर महीने बैंक या लेंडर को चुकानी होती है. लेकिन अगर आप ऐसी प्रॉपर्टी खरीद रहे हैं जो अभी निर्माणाधीन है, तो वहां प्री-EMI का सिस्टम लागू होता है.
इस स्थिति में, बैंक पूरी लोन राशि एक बार में नहीं देता, बल्कि डेवलपर की जरूरत और निर्माण की प्रगति के हिसाब से आपको राशि हिस्सों में मिलती जाती है.
जैसे-जैसे आपको लोन की राशि मिलती है, उसी के आधार पर आपको सिर्फ उस रकम पर ब्याज चुकाना पड़ता है. इस ब्याज को ही प्री-EMI ब्याज कहा जाता है.
अगर आप चाहें तो सिर्फ ब्याज भरने के बजाय मूलधन की किस्त भी शुरू कर सकते हैं, यानी EMI पहले दिन से शुरू कर सकते हैं. इसके लिए आपको लोन को हिस्सों में बांटकर, जारी की गई कुल राशि पर EMI शुरू करनी होती है.
होम लोन की अवधि अधिकतम 30 साल तक हो सकती है. अवधि बढ़ेगी तो EMI कम होगी, लेकिन ब्याज ज्यादा देना पड़ेगा.
होम लोन लेते समय Loan Protection Insurance लेना अच्छा रहता है. किसी तरह की अनहोनी की स्थिति में ये लोन आपका सहारा बनता है और आपके परिवार को कर्ज से मुक्ति दिलाता है.
अपनी EMI समय पर चुकाते रहना हमेशा सबसे सही और सुरक्षित तरीका है. लेकिन अगर कोई ग्राहक लगातार तीन या उससे ज्यादा किस्तें नहीं भरता है, तो इसे डिफॉल्ट माना जाता है.
ऐसी स्थिति में SARFAESI Act, 2002 के तहत बैंक या लेंडर को ये अधिकार मिल जाता है कि वो बिना कोर्ट की अनुमति के सीधे कार्रवाई कर सकता है. यानी आपके खिलाफ कदम उठाने के लिए बैंक को अदालत जाने की जरूरत नहीं पड़ती.
अगर आपको आर्थिक परेशानी है और EMI भरना मुश्किल हो रहा है, तो चुप रहने की बजाय तुरंत अपने लेंडर से बात करना बेहतर है. कई बार बैंक रीपेमेंट पीरियड बढ़ा देते हैं या कुछ समय के लिए राहत भी दे सकते हैं. इसलिए समस्या बढ़ने से पहले समाधान ढूंढना ही समझदारी है.