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आज के समय में घर खरीदना आसान काम नहीं है. प्रॉपर्टी की आसमान छूती कीमतों के बीच सिर्फ Home Loan ही आपके इस सपने को पूरा करा सकता है. लेकिन होम लोन को लेकर तमाम लोगों के बीच ऐसी गलतफहमियां (Home Loan Myths) फैली हैं, जिनकी सच्चाई अगर आपने नहीं जानी तो आपको बाद में नुकसान उठाना पड़ेगा. यहां जानिए ऐसी 7 गलतफहमियों की सच्चाई.
ये होम लोन से जुड़ा एक आम मिथक है. क्या कम EMI हमेशा फायदेमंद होती है? ज़रूरी नहीं. उदाहरण के तौर पर, 30 साल के लोन की EMI 20 साल के लोन की तुलना में काफी कम होगी, लेकिन लंबी अवधि का मतलब है कि आप पूरी लोन अवधि में ज़्यादा ब्याज चुकाएंगे.
दूसरा सवाल ये है कि क्या कम ब्याज दरें हमेशा बेहतर होती हैं? आम तौर पर हां, लेकिन आपको कुल लागत पर ध्यान देना चाहिए. कुछ बैंक शुरुआत में कम ब्याज दर देते हैं, लेकिन रेपो रेट के आधार पर ब्याज दरों का रीसेट जल्दी नहीं होता. यानी, बाजार में ब्याज दरें घटने पर भी आपको उसका फायदा नहीं मिल पाता. साथ ही, कुछ लोनदाता कम ब्याज दर तो देते हैं, लेकिन प्रीपेमेंट चार्जेस बहुत ज़्यादा लेते हैं. इसलिए, सिर्फ ब्याज की दर नहीं, कुल लागत पर ध्यान देना ज्यादा समझदारी होगी.
ये एक बड़ी गलतफहमी है कि होम लोन में प्रीपेमेंट चार्ज नहीं लगता. असल में, RBI ने केवल फ्लोटिंग रेट होम लोन को ही प्रीपेमेंट चार्ज से मुक्त रखा है. फिक्स्ड रेट लोन पर अब भी बैंक प्रीपेमेंट चार्ज लगा सकते हैं. यहां तक कि फ्लोटिंग लोन में भी शुरुआती लॉक-इन पीरियड या आंशिक प्रीपेमेंट लिमिट हो सकती है.
CIBIL Score 750 से ऊपर होना अच्छा है, लेकिन ये होम लोन मिलने की गारंटी नहीं है. बैंक सिर्फ स्कोर नहीं देखते, बल्कि आपकी आमदनी, नौकरी की स्थिरता, उम्र, लोन-टू-वैल्यू रेश्यो और प्रॉपर्टी की लोकेशन जैसी चीजें भी जांचते हैं. अगर CIBIL कम भी हो, लेकिन अन्य फैक्टर मजबूत हैं, तो लोन मिल सकता है.
ये बात आधी सही है लेकिन आधी गलत भी. हां, आप प्रीपेमेंट के बाद ब्याज पर मिलने वाला टैक्स बेनेफिट खो देते हैं, लेकिन याद रखिए कि लोन की शुरुआती EMI में ही ज्यादा ब्याज चुकाया जाता है.10-12 साल बाद ज्यादातर प्रिंसिपल ही बचता है. ऐसे में प्रीपेमेंट आपको टेंशन-फ्री प्रॉपर्टी ओनर बना देता है और क्रेडिट स्कोर भी बढ़ाता है.
बहुत से लोग मानते हैं कि होम लोन ब्याज दर RBI तय करता है. असल में RBI सिर्फ रेपो रेट तय करता है. बैंक अपने फंडिंग कॉस्ट के हिसाब से ब्याज दर तय करते हैं. किसी भी बैंक में दो लोगों को अलग-अलग ब्याज दर पर लोन मिल सकता है, उनके क्रेडिट प्रोफाइल पर निर्भर करते हुए.
ये सच है कि जब आप कम उम्र में होम लोन लेते हैं, तो आपको लंबी अवधि मिलती है और ईएमआई भी कम देनी पड़ती है. लेकिन यही एकमात्र समस्या नहीं है. ज़्यादातर लोगों को अपने करियर में स्टेबल होने और ये तय करने में थोड़ा समय लगता है कि वे किस शहर में बसना चाहते हैं. अगर आपको बाद में घर छोड़ना है तो घर खरीदने का कोई मतलब नहीं है. इसलिए होम लोन लेने का फैसला लेने से पहले, कुछ साल इंतज़ार करना और यह तय करना बेहतर है कि आप कहां बसना चाहते हैं. जिस घर को आप बना रहे हैं, उसमें ही रहना समझदारी है.
ज्यादातर लोग फिक्स्ड रेट लोन को बेहतर मानते हैं, जबकि सच्चाई ये है कि बाजार में ब्याज दर घटने पर इसका फायदा नहीं मिलता. ऊपर से, कई "फिक्स्ड लोन" में भी क्लॉज होते हैं जिन्हें बैंक कभी भी रिवाइज कर सकते हैं.