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सांकेतिक तस्वीर
पूरी दुनिया की नजरें इस समय मिडिल ईस्ट में चल रहे युद्ध और उससे बिगड़ते आर्थिक हालातों पर टिकी हैं. कल का दिन वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए बहुत बड़ा था. दुनिया के तीन सबसे ताकतवर केंद्रीय बैंकों- अमेरिका का फेडरल रिजर्व, बैंक ऑफ इंग्लैंड और यूरोपियन सेंट्रल बैंक (ECB) ने एक सुर में ब्याज दरों को लेकर अपने पत्ते खोल दिए हैं.
ईरान युद्ध की वजह से पैदा हुई अनिश्चितता ने इन बैंकों को एक ऐसी उलझन में डाल दिया है जहां एक तरफ महंगाई का खतरा है और दूसरी तरफ आर्थिक रफ्तार सुस्त पड़ने का डर. इसी उधेड़बुन के बीच बैंकों ने फिलहाल दरों को स्थिर रखने का रास्ता चुना है. आइए समझते हैं कि लंदन से लेकर फ्रैंकफर्ट और वाशिंगटन तक क्या बड़े फैसले हुए हैं और इनका मतलब क्या है.
लंदन में बैंक ऑफ इंग्लैंड के नौ सदस्यों ने मिलकर एक सुर में फैसला लिया कि फिलहाल ब्याज दरों को 3.75 प्रतिशत पर ही रखा जाएगा. लेकिन कहानी सिर्फ इतनी नहीं है. बैंक ने साफ चेतावनी दी है कि मिडिल ईस्ट में जारी संघर्ष की वजह से महंगाई बढ़ने का जोखिम बहुत ज्यादा है.
इस फैसले का असर बाजार पर तुरंत दिखा. शार्ट-डेटेड गिल्ट्स (सरकारी बॉन्ड) की जमकर बिक्री हुई. दो साल के गिल्ट की यील्ड बढ़कर 4.38 प्रतिशत पर पहुँच गई, जो करीब एक साल का सबसे ऊंचा स्तर है. बाजार अब यह मानकर चल रहा है कि बैंक इस साल के अंत तक दो बार और ब्याज दरें बढ़ा सकता है. फिलहाल पाउंड स्टर्लिंग डॉलर के मुकाबले 1.3297 और यूरो के मुकाबले 86.30 पेंस पर मजबूती के साथ टिका हुआ है.
यूरोप की आर्थिक राजधानी फ्रैंकफर्ट में यूरोपियन सेंट्रल बैंक (ECB) ने भी अपनी चाबी घुमाने से मना कर दिया है. ईसीबी ने अपनी बेंचमार्क जमा दर (Deposit Rate) को 2 प्रतिशत पर ही छोड़ दिया है. बैंक ने आगाह किया है कि ईरान युद्ध के कारण ऊर्जा की कीमतें बढ़ेंगी, जिससे थोड़े समय के लिए महंगाई में उछाल आ सकता है.
ईसीबी का कहना है कि युद्ध ने भविष्य के अनुमानों को बहुत धुंधला कर दिया है. एक तरफ महंगाई बढ़ने का डर है, तो दूसरी तरफ डर यह भी है कि कहीं इस संकट की वजह से यूरोप की आर्थिक ग्रोथ ही न रुक जाए. हालांकि, यूरोप में महंगाई फरवरी में गिरकर 1.9 प्रतिशत पर आ गई थी, जो बैंक के 2 प्रतिशत के लक्ष्य के एकदम करीब है, लेकिन युद्ध ने इस सुकून को बेचैनी में बदल दिया है.
इससे पहले बुधवार को अमेरिकी फेडरल रिजर्व ने भी ब्याज दरों में कोई बदलाव नहीं करने का फैसला लिया था. फेड चेयरमैन जेरोम पॉवेल ने साफ कहा कि ईरान युद्ध के बाद अमेरिकी अर्थव्यवस्था और महंगाई को लेकर अनिश्चितता काफी बढ़ गई है. उन्होंने संकेत दिए कि फेड लंबे समय तक ब्याज दरों को इसी स्तर पर स्थिर रख सकता है. दुनिया भर के केंद्रीय बैंक इस समय एक अजीब सी कशमकश में हैं. आमतौर पर जब महंगाई बढ़ती है, तो बैंक दरें बढ़ाते हैं, और जब मंदी आती है, तो दरें घटाते हैं. लेकिन अभी महंगाई और मंदी दोनों का खतरा एक साथ सिर उठाए खड़ा है.
युद्ध का सबसे बड़ा असर तेल और गैस की सप्लाई पर पड़ता है. अगर ऊर्जा की कीमतें बढ़ती हैं, तो हर चीज महंगी हो जाएगी. बैंक जानते हैं कि अगर उन्होंने महंगाई रोकने के लिए ब्याज दरें बहुत ज्यादा बढ़ा दीं, तो लोगों के लिए कर्ज लेना मुश्किल हो जाएगा और व्यापार ठप पड़ सकते हैं. वहीं, अगर दरें नहीं बढ़ाईं, तो महंगाई आम आदमी की कमर तोड़ देगी. ईसीबी ने कहा है कि वह भविष्य के डेटा को देखकर ही अगला कदम उठाएगा, यानी अभी 'देखो और इंतजार करो' की नीति ही सबसे बेहतर है.
Q: बैंक ऑफ इंग्लैंड ने ब्याज दरों को लेकर क्या फैसला लिया?
A: बैंक ऑफ इंग्लैंड ने ब्याज दरों को सर्वसम्मति से 3.75 प्रतिशत पर स्थिर रखने का फैसला किया है, लेकिन भविष्य में इसके बढ़ने की संभावना जताई है.
Q: यूरोपियन सेंट्रल बैंक (ECB) की वर्तमान जमा दर क्या है?
A: ईसीबी ने अपनी बेंचमार्क जमा दर को 2 प्रतिशत पर बरकरार रखा है, जहाँ यह जून 2025 से बनी हुई है.
Q: ईरान युद्ध का वैश्विक महंगाई पर क्या असर पड़ सकता है?
A: युद्ध के कारण ऊर्जा की कीमतें बढ़ने की आशंका है, जिससे कम समय के लिए महंगाई में तेज उछाल आ सकता है.
Q: फेडरल रिजर्व के चेयरमैन जेरोम पॉवेल का क्या कहना है?
A: जेरोम पॉवेल ने कहा कि युद्ध की वजह से अमेरिकी अर्थव्यवस्था का भविष्य अनिश्चित हो गया है, इसलिए फेड लंबे समय तक दरों को स्थिर रख सकता है.
Q: क्या भविष्य में ब्याज दरें बढ़ेंगी?
A: बैंक ऑफ इंग्लैंड के रुख को देखते हुए मनी मार्केट के जानकारों का मानना है कि इस साल के अंत तक दो बार ब्याज दरें बढ़ाई जा सकती हैं.