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भारत में DICGC यानी Deposit Insurance and Credit Guarantee Corporation बैंक डिपॉजिट पर ₹5 लाख तक का बीमा कवर देता है. प्रतीकात्मक फोटो (AI/ChatGPT)
अक्सर लोग बैंक में पैसा जमा करते समय यह मान लेते हैं कि उनका पूरा पैसा हमेशा सुरक्षित रहेगा. लेकिन अगर किसी बैंक पर वित्तीय संकट आ जाए, बैंक बंद हो जाए या RBI उसका लाइसेंस रद्द कर दे, तब सबसे बड़ा सवाल यही होता है कि “क्या हमारा पैसा वापस मिलेगा?”
यहीं पर DICGC यानी Deposit Insurance and Credit Guarantee Corporation की भूमिका शुरू होती है. यह संस्था जमाकर्ताओं को एक तय सीमा तक सुरक्षा देती है, ताकि बैंक डूबने की स्थिति में आम लोगों की मेहनत की कमाई पूरी तरह खत्म न हो जाए.
Deposit Insurance and Credit Guarantee Corporation भारत की बैंक डिपॉजिट इंश्योरेंस संस्था है. यह RBI की पूर्ण स्वामित्व वाली सहायक संस्था है जो बैंक जमाओं पर बीमा सुरक्षा देती है. इसका काम यह सुनिश्चित करना है कि अगर कोई बीमित बैंक फेल हो जाए, तो जमाकर्ताओं को तय सीमा तक पैसा वापस मिल सके.
जब भी किसी बैंक का लाइसेंस रद्द होता है तो उसके ग्राहकों के मन में कई सवाल उठते हैं. जैसे एफडी का पैसा तो सुरक्षित है, लेकिन सेविंग्स और करंट अकाउंट का क्या? क्या को-ऑपरेटिव बैंक में पैसे जमा करने वालों को भी इसका फायदा मिलेगा? क्या सबको 5 लाख रुपये दिए जाएंगे या इसका भी कोई नियम है? इसी को ध्यान में रखते हुए आज हम भारतीय रिजर्व बैंक की वेबसाइट से आपके लिए लाए हैं इस तरह के हर सवाल का जवाब.
कमर्शियल बैंक: भारत में काम करने वाले सभी कमर्शियल बैंक, विदेशी बैंकों की शाखाएं, लोकल एरिया बैंक और रीजनल रूरल बैंक DICGC के तहत कवर होते हैं.
कोऑपरेटिव बैंक: सभी शहरी सहकारी बैंक, राज्य सहकारी बैंक और केंद्रीय सहकारी बैंक DICGC के तहत बीमित हैं.
ध्यान दें: प्राथमिक सहकारी समितियां (Primary Cooperative Societies) DICGC के तहत कवर नहीं होतीं.
DICGC सेविंग अकाउंट, FD, RD, करंट अकाउंट जैसी लगभग सभी जमा राशियों का बीमा करता है. लेकिन इनका बीमा नहीं होता:
एक बैंक में एक जमाकर्ता को अधिकतम ₹5 लाख तक का बीमा मिलता है. इसमें मूल रकम (Principal) + ब्याज (Interest) दोनों शामिल होते हैं.
बैंक शाखा में DICGC बीमा संबंधी जानकारी का बोर्ड या पर्चा लगा होता है. अगर शक हो तो बैंक अधिकारी से पूछ सकते हैं.
एक ही बैंक की सभी शाखाओं में आपकी जमा राशि जोड़कर देखी जाती है. कुल मिलाकर अधिकतम ₹5 लाख तक का ही बीमा मिलेगा.
बीमा मूल रकम + जमा ब्याज दोनों पर मिलता है. एक उदाहरण से समझते हैं:
| मूल रकम | ब्याज | कुल राशि | बीमित राशि |
| ₹4,95,000 | ₹4,000 | ₹4,99,000 | ₹4,99,000 |
| ₹5,00,000 | ₹10,000 | ₹5,10,000 | ₹5,00,000 |
नहीं. अगर सभी अकाउंट एक ही नाम और एक ही प्रकार के हैं, तो सभी रकम जोड़ दी जाएगी. लेकिन अलग क्षमता (जैसे पार्टनर, गार्जियन, ज्वाइंट अकाउंट) में अकाउंट होने पर अलग बीमा मिल सकता है.
हां. हर बैंक में आपको अलग से ₹5 लाख तक का बीमा मिलेगा.
दोनों बैंकों का बीमा अलग-अलग माना जाएगा. हर बैंक में अलग ₹5 लाख तक का कवर मिलेगा.
अगर कोई व्यक्ति अपने नाम से कई अकाउंट खोलता है, तो सभी रकम जोड़ दी जाती है. लेकिन अगर वही व्यक्ति:
तो ऐसे अकाउंट अलग माने जाते हैं और अलग बीमा मिलता है.
| अकाउंट प्रकार | कुल जमा राशि | बीमा कवर |
| S.K. Pandit (व्यक्तिगत) | ₹5,19,200 | ₹5,00,000 |
| पार्टनर - ABC & Co. | ₹5,25,000 | ₹5,00,000 |
| गार्जियन - Master Ajit | ₹4,77,800 | ₹4,77,800 |
| डायरेक्टर - J.K. Udyog | ₹6,75,000 | ₹5,00,000 |
| पत्नी के साथ ज्वाइंट अकाउंट | ₹6,07,500 | ₹5,00,000 |
ज्वाइंट अकाउंट पर नियम
अगर A और B के नाम से कई ज्वाइंट अकाउंट हैं और नामों का क्रम एक जैसा है, तो सभी अकाउंट जोड़ दिए जाएंगे. लेकिन अगर नामों का क्रम बदल जाए, जैसे:
तो हर अकाउंट को अलग माना जाएगा और अलग बीमा मिलेगा.
हां. अगर आपका बैंक पर कोई बकाया है, तो बैंक उसे जमा राशि से एडजस्ट कर सकता है. बीमा बाकी बची रकम पर मिलेगा.
पूरा प्रीमियम बैंक देता है. जमाकर्ता को कोई पैसा नहीं देना पड़ता.
अगर कोई बैंक बंद हो जाता है (Liquidation में चला जाता है), तो DICGC उस बैंक के लिक्विडेटर को हर जमाकर्ता की बीमित रकम (अधिकतम ₹5 लाख तक) का भुगतान करता है. यह भुगतान दावा सूची (Claim List) मिलने के 2 महीने के अंदर किया जाता है. इसके बाद लिक्विडेटर संबंधित ग्राहकों को उनका पैसा देता है.
अगर किसी बैंक का दूसरे बैंक में विलय (Merger), पुनर्गठन (Reconstruction) या अधिग्रहण (Amalgamation) होता है, तो DICGC संबंधित बैंक को वह रकम देता है जो ग्राहक की कुल जमा राशि और लागू बीमा सीमा (जो भी कम हो) तथा मर्जर योजना के तहत मिली रकम के बीच का अंतर हो. यह भुगतान भी दावा सूची मिलने के 2 महीने के अंदर किया जाता है.
नहीं. अगर कोई बैंक बंद हो जाता है, तो बैंक का लिक्विडेटर सभी जमाकर्ताओं की क्लेम लिस्ट तैयार करके DICGC को भेजता है. जांच के बाद DICGC पैसा लिक्विडेटर को देता है और फिर लिक्विडेटर ग्राहकों को उनका भुगतान करता है. अगर किसी बैंक का दूसरे बैंक में विलय (Merger) हो जाता है, तो DICGC संबंधित ग्राहकों की राशि नए या ट्रांसफर लेने वाले बैंक को देता है.
नहीं. भारत में डिपॉजिट इंश्योरेंस जरूरी है.
अगर कोई बीमित बैंक लगातार 3 बार DICGC का प्रीमियम नहीं भरता, तो DICGC उसका रजिस्ट्रेशन रद्द कर सकता है. ऐसी स्थिति में बैंक का बीमा कवर हटाए जाने की जानकारी अखबारों के जरिए जनता को दी जाती है.
इन परिस्थितियों में भी बैंक का DICGC रजिस्ट्रेशन रद्द हो सकता है:
हालांकि, रजिस्ट्रेशन रद्द होने की तारीख तक बैंक में जमा रकम पर बीमा सुरक्षा लागू रहती है.
देखें कि किसी एक बैंक में आपकी कुल राशि ₹5 लाख से ज्यादा तो नहीं.
जरूरत हो तो रकम अलग-अलग बैंकों में बांटें.
नामों के क्रम के आधार पर अलग इंश्योरेंस बेनेफिट मिल सकता है.
उच्च ब्याज के लालच में पूरा पैसा एक ही छोटे बैंक में न रखें.
बीमा सीमा में principal और accrued interest दोनों शामिल होते हैं.
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आर्टिकल से जुड़े महत्वपूर्ण सवाल (FAQs)
Q1 DICGC क्या है?
DICGC भारत की deposit insurance संस्था है जो बैंक जमा पर ₹5 लाख तक सुरक्षा देती है.
Q2 क्या FD भी DICGC के तहत इंश्योर्ड होती है?
हां, Fixed Deposit भी DICGC insurance के दायरे में आती है.
Q3 क्या Savings और FD अलग-अलग इंश्योर्ड होते हैं?
नहीं, एक ही बैंक में सभी deposits जोड़कर कुल insurance limit तय होती है.
Q4 DICGC इंश्योरेंस लिमिट कितनी है?
DICGC प्रति बैंक प्रति जमाकर्ता अधिकतम ₹5 लाख तक का बीमा कवर देता है.
Q5 क्या को-ऑपरेटिव बैंक भी इंश्योर्ड हैं?
हां, अधिकांश को-ऑपरेटिव बैंक DICGC insurance के दायरे में आते हैं.