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बैंक ऑफ बड़ौदा बना देश का पहला 'ग्रीन बॉन्ड' जारी करने वाला बैंक (Image Source- X)
भारत के बैंकिंग सेक्टर के लिए आज का दिन सुनहरे अक्षरों में लिखा जाएगा. सरकारी क्षेत्र के दिग्गज बैंक, 'बैंक ऑफ बड़ौदा' (BoB) ने एक ऐसा मुकाम हासिल किया है जो अब तक देश का कोई भी बैंक नहीं कर पाया था. बैंक ऑफ बड़ौदा घरेलू बाजार में 'ग्रीन इंफ्रास्ट्रक्चर बॉन्ड' (Green Infrastructure Bonds) को सफलतापूर्वक जारी करने वाला भारत का पहला बैंक बन गया है.
यह खबर केवल बैंकिंग तक सीमित नहीं है, बल्कि यह भारत के पर्यावरण के प्रति बढ़ते झुकाव और सस्टेनेबल डेवलपमेंट की दिशा में एक बहुत बड़ा कदम है. बैंक ने अपने सोशल मीडिया अकाउंट 'X' के जरिए इस बड़ी उपलब्धि की जानकारी साझा की. आइए जानते हैं कि आखिर ये ग्रीन बॉन्ड क्या हैं और इनसे क्या बदलाव आएगा.
बैंक ऑफ बड़ौदा ने सीरीज-I लॉन्ग टर्म ग्रीन इंफ्रास्ट्रक्चर बॉन्ड के जरिए कुल 10,000 करोड़ रुपये जुटाए हैं. इस बॉन्ड की कुछ खास बातें आपको हैरान कर देंगी-
निवेशकों की भीड़: बैंक ने शुरुआत में 5,000 करोड़ रुपये जुटाने का लक्ष्य रखा था, लेकिन निवेशकों का भरोसा इतना ज्यादा था कि बैंक को 16,415 करोड़ रुपये की बोलियां मिलीं. यानी बेस साइज से 3 गुना से भी ज्यादा की डिमांड.
इसे बाजार की भाषा में 'ग्रीनियम' (Greenium) कहा जा रहा है, जो यह दिखाता है कि लोग अब पर्यावरण को बचाने वाले प्रोजेक्ट्स में पैसा लगाने के लिए कितने उत्साहित हैं.
सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर बैंक इस 10,000 करोड़ रुपये का करेगा क्या. बैंक ऑफ बड़ौदा के मैनेजिंग डायरेक्टर और सीईओ डॉ. देवदत्त चंद ने साफ किया है कि यह पैसा केवल खास 'ग्रीन प्रोजेक्ट्स' के लिए इस्तेमाल होगा.
जब भी बात निवेश की आती है, तो सुरक्षा सबसे पहले आती है. बैंक ऑफ बड़ौदा के इन ग्रीन बॉन्ड्स को क्रेडिट रेटिंग एजेंसियों (CARE Ratings और ICRA) ने 'AAA' रेटिंग दी है. इसका मतलब है कि इसमें पैसा लगाना पूरी तरह सुरक्षित है और इसमें रिस्क की गुंजाइश न के बराबर है. यह रेटिंग घरेलू कर्ज बाजार में सबसे ऊंची और विश्वसनीय श्रेणी मानी जाती है.
बैंक ऑफ बड़ौदा की इस पहल ने दूसरे भारतीय बैंकों के लिए एक मिसाल पेश कर दी है. अब तक भारतीय बैंक अक्सर विदेशों से ग्रीन फंड जुटाते थे, लेकिन बैंक ऑफ बड़ौदा ने दिखा दिया कि भारत के घरेलू बाजार में भी पर्यावरण के प्रति जागरूकता और निवेश की अपार संभावनाएं हैं. यह कदम भारत के 'नेट जीरो' (Net Zero) लक्ष्य को हासिल करने में मील का पत्थर साबित होगा.