Interesting Facts: जब भी आप किसी फ्लाइट में चढ़ते हैं, क्या आपने गौर किया है कि हमेशा प्लेन के बाईं तरफ (Left Side) से ही यात्रियों को चढ़ाया जाता है? चाहे घरेलू उड़ान हो या अंतरराष्ट्रीय हर जगह यही नियम लागू है. लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि ऐसा क्यों होता है? क्या ये सिर्फ परंपरा है या इसके पीछे कोई वैज्ञानिक, तकनीकी और ऐतिहासिक कारण भी हैं? आइए जानते हैं, आखिर क्यों दुनिया भर में प्लेन में बाईं ओर से ही बोर्डिंग कराई जाती है और दाईं ओर से नहीं.
1/7यह परंपरा एविएशन से बहुत पहले यानी समुद्री यात्रा (Marine Navigation) के दौर से चली आ रही है. पुराने समय में जब शिप्स (जहाज़) चलते थे, तब यात्रियों को हमेशा बाईं ओर (Port Side) से ही जहाज़ पर चढ़ाया जाता था. दाईं ओर जहाज़ का स्टेयरिंग व्हील (Rudder या Starboard) होता था, जिससे नियंत्रण किया जाता था. इसलिए यात्रियों को दाईं ओर से चढ़ाना खतरनाक माना जाता था. जब बाद में हवाई जहाज़ों का दौर शुरू हुआ, तो उसी ‘Port Side Tradition’ को अपनाया गया, यानी, एयरक्राफ्ट में भी बोर्डिंग हमेशा बाईं ओर से ही.
2/7प्लेन की राइट साइड (Starboard Side) सिर्फ यात्रियों के लिए नहीं होती. वहां आमतौर पर फ्यूल ट्रक, लगेज लोडिंग, केटरिंग वर्क, और कार्गो लोडिंग होती है. दाईं ओर से फ्यूल पाइपलाइन जोड़ी जाती है, इंजीनियरिंग स्टाफ काम करता है, और प्लेन के उपकरणों की जांच होती है. अगर यात्रियों को भी उसी साइड से चढ़ाया जाए, तो वहाँ सुरक्षा का बड़ा खतरा पैदा हो सकता है.
3/7आपको जानकर हैरानी होगी कि हर कमर्शियल एयरलाइनर में पायलट की सीट हमेशा बाईं ओर होती है. यह भी एक बड़ा कारण है कि यात्रियों को उसी दिशा से बोर्ड कराया जाता है, ताकि पायलट को रनवे और गेट दोनों का व्यू क्लियर रहे. इससे पायलट को विमान की अलाइनमेंट (alignment) और ग्राउंड टीम से कम्युनिकेशन बनाए रखने में आसानी होती है. यह डिजाइन पिछले कई दशकों से इंटरनेशनल स्टैंडर्ड बन चुका है, जिसे लगभग सभी देशों की एयरलाइंस फॉलो करती हैं.
4/7एयरलाइंस का हर मिनट कीमती होता है. अगर यात्रियों को दाईं ओर से चढ़ाया जाए, जहाँ लगेज, ईंधन और कार्गो का काम चल रहा होता है, तो फ्लाइट में डिले और कंफ्यूजन की संभावना बढ़ जाएगी. बाईं ओर से एंट्री देने से ग्राउंड स्टाफ को दोनों साइडों पर एक साथ काम करने की सुविधा मिलती है, बाईं तरफ से पैसेंजर्स चढ़ते हैं, दाईं तरफ से लगेज और फ्यूल का काम चलता है.
5/7अधिकांश हवाई जहाज़ों को इस तरह डिजाइन किया गया है कि बोर्डिंग डोर्स बाईं ओर ही हों. एयरपोर्ट टर्मिनल के पैसेंजर ब्रिज (Jet Bridge) या सीढ़ियाँ (Stairs) भी इसी दिशा में लगाई जाती हैं. दाईं ओर आमतौर पर इंजन, फ्यूल सिस्टम और मेंटेनेंस एरिया होता है, जहाँ यात्रियों का पहुँचना सुरक्षित नहीं होता. बाईं ओर से बोर्डिंग कराने से यात्रियों को सीधे केबिन में प्रवेश मिलता है और किसी तकनीकी हिस्से से दूर रखा जाता है, यानी, सुरक्षा और सुविधा दोनों बनी रहती हैं.
6/7कुछ छोटे प्राइवेट जेट्स या मिलिट्री एयरक्राफ्ट्स में यात्रियों को दाईं ओर से भी प्रवेश कराया जाता है, लेकिन कमर्शियल फ्लाइट्स में यह बहुत दुर्लभ है. लगभग 99% कमर्शियल एयरलाइंस आज भी उसी परंपरा को फॉलो करती हैं- Passengers always board from the left!
7/7तो अगली बार जब आप प्लेन में चढ़ें, तो याद रखें आप सिर्फ एक दरवाज़े से नहीं, बल्कि सदियों पुरानी परंपरा और आधुनिक विज्ञान के मेल से गुजर रहे हैं. बाईं ओर से चढ़ना न केवल सुरक्षा का उपाय है, बल्कि यह एयरलाइंस की ऑपरेशनल एफिशिएंसी और यात्रियों की सुविधा से भी जुड़ा हुआ है.