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AI जनरेटेड फोटो
अमेरिका-ईरान के बीच 13 दिन से तनाव की स्थिति बनी हुई है. अमेरिका-इजरायल की ओर से ईरान पर कई तरह से हमले किए, ईरान ने भी इसका पलटवार किया. इसी बीच ईरान के हॉर्मुज स्ट्रेट को लेकर भी तनाव की स्थिति बनी हुई है, जिसका सीधा असर भारतीय ऑटो बाजार में देखने को मिल रहा है. बता दें कि ऑटो मार्केट के लिए होने वाले एक्सपोर्ट पर इसका सीधा असर पड़ रहा है.
MENA रीजन पर कई दिग्गज भारतीय ऑटो कंपनियों का एक्सपोजर है. ये रीजन मिडिल ईस्ट और नॉर्थ अफ्रीका का डायवर्सिफाइड एरिया है, जो 19-20 देशों को जोड़ता है. इस रीजन का भारतीय ऑटो कंपनियों के एक्सपोर्ट पर असर पड़ा है.
मिडिल ईस्ट क्राइसिस का भारतीय ऑटो सेक्टर पर 2 बड़े इम्पैक्ट देखने को मिले हैं. पहला MENA रीजन का एक्सपोर्ट पर असर दिखा है क्योंकि ये रीजन मिडिल ईस्ट और नॉर्थ अफ्रीका का बड़ा हिस्सा रखता है. दूसरा, फ्रेट रेट और क्रूड की कीमते बढ़ने का भी इम्पैक्ट देखने को मिल सकता है.
| Company | Export as % of Total Volume | MENA as % of Exports |
|---|---|---|
| Maruti Suzuki | 15% | 12.5% |
| Hyundai Motors | 21% | 40% |
| JLR | 77% (ex-UK) | 8% |
| Bajaj Auto | 40% | 10–15% |
| TVS Motor | 25% | <3% |
| Eicher Motors | 11% | 26% |
| Ashok Leyland | 8% | 30–40% |
| Tata Motors CV | 5% | Almost 80% |
इस टेबल में महिंद्रा एंड महिंद्रा और हीरो मोटोकॉर्प का नाम नहीं है, क्योंकि इन दोनों का MENA रीजन में सबसे कम एक्सपोजर है. वहीं दिग्गज ऑटो कंपनी टाटा मोटर्स सीवी (Tata Motors CV) की हिस्सेदारी सबसे ज्यादा है, जो 80% के आसपास है.
देश में गैस की संभावित कमी का असर ऑटो सेक्टर पर पड़ सकता है. खासतौर पर वे कंपनियां ज्यादा प्रभावित हो सकती हैं, जिनके मैन्युफैक्चरिंग प्रोसेस में गैस का इस्तेमाल ज्यादा होता है. ऑटो कंपनियां गाड़ियों की पेंटिंग, फर्नेस और हीट ट्रीटमेंट जैसे अहम कामों के लिए गैस का इस्तेमाल करती हैं. ऐसे में सप्लाई में कमी आने पर प्रोडक्शन पर दबाव बढ़ सकता है.
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ऑटो इंडस्ट्री में गैस एक महत्वपूर्ण इनपुट है. गाड़ियों के कई मैन्युफैक्चरिंग प्रोसेस में लगातार और स्थिर ऊर्जा की जरूरत होती है. अगर गैस की सप्लाई प्रभावित होती है तो कंपनियों के लिए तुरंत किसी वैकल्पिक ऊर्जा स्रोत पर शिफ्ट होना आसान नहीं होता.
मशीनरी और मैन्युफैक्चरिंग सेटअप को दूसरे फ्यूल पर चलाने के लिए बड़े बदलाव करने पड़ते हैं, जो नियर टर्म में संभव नहीं माने जाते. इसलिए अगर गैस की कमी होती है तो कंपनियों के प्रोडक्शन शेड्यूल पर असर पड़ सकता है.
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इस समय कई ऑटो कंपनियां हाई कैपेसिटी यूटिलाइजेशन पर काम कर रही हैं. यानी उनकी फैक्ट्रियां लगभग पूरी क्षमता से चल रही हैं. ऐसे में गैस सप्लाई में रुकावट आने पर प्रोडक्शन को मैनेज करना ज्यादा मुश्किल हो सकता है.
इस कैटेगरी में ये कंपनियां शामिल हैं:
कुछ ऑटो कंपनियों का गैस पर निर्भरता अपेक्षाकृत ज्यादा मानी जाती है. ऐसे में गैस की कमी होने पर इन कंपनियों पर असर अधिक देखने को मिल सकता है. इनमें प्रमुख नाम हैं:
सिर्फ ऑटो कंपनियां ही नहीं, बल्कि कई ऑटो कंपोनेंट सप्लायर कंपनियां भी गैस सप्लाई पर निर्भर हैं. अगर गैस की कमी बढ़ती है तो इनके प्रोडक्शन और सप्लाई चेन पर भी असर पड़ सकता है. संभावित रूप से प्रभावित सप्लायर कंपनियों में शामिल हैं:
अगर गैस सप्लाई की स्थिति लंबी अवधि तक प्रभावित रहती है, तो ऑटो सेक्टर में प्रोडक्शन शेड्यूल, लागत और डिलीवरी टाइमलाइन पर असर पड़ सकता है. हालांकि इंडस्ट्री फिलहाल स्थिति पर नजर बनाए हुए है और कंपनियां वैकल्पिक उपायों की संभावनाओं पर भी काम कर रही हैं.
1. अमेरिका-ईरान तनाव से ऑटो सेक्टर पर क्या असर है?
मिडिल ईस्ट तनाव से भारतीय ऑटो कंपनियों के MENA एक्सपोर्ट और फ्रेट कॉस्ट पर असर पड़ सकता है.
2. MENA रीजन क्या है?
MENA यानी Middle East और North Africa के करीब 19–20 देशों का क्षेत्र, जो भारतीय ऑटो एक्सपोर्ट के लिए अहम बाजार है.
3. किस कंपनी का MENA में सबसे ज्यादा एक्सपोजर है?
Tata Motors (CV बिजनेस) का MENA में सबसे ज्यादा, करीब 80% के आसपास एक्सपोजर बताया जाता है.
4. गैस की कमी से ऑटो सेक्टर पर क्या असर पड़ेगा?
गैस की कमी से पेंटिंग, फर्नेस और हीट ट्रीटमेंट जैसे मैन्युफैक्चरिंग प्रोसेस प्रभावित हो सकते हैं.
5. किन कंपनियों पर गैस एक्सपोजर ज्यादा है?
Maruti Suzuki, TVS Motor और Bajaj Auto पर गैस एक्सपोजर अपेक्षाकृत ज्यादा माना जाता है.
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